वास्तु शास्त्र - What is Vastu Shastra, Vastu Purush, Tips, Effect & Importance in Life

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Vastu shastra, भारत में वैदिक काल से चली आ रही एक प्रकार की Science है जो किसी भी Land, Building में Construction करने, उसमे निवास करने, उपयोग करने और उससे शुभ - अशुभ प्रभावों की जानकारी प्रदान करता  है. Vastu Shastra एक प्रकार से वस्तु का विज्ञान ही है. Vastu Shastra एक पौराणिक सनातन धर्म ज्ञान है, जो हमें निमार्ण करने की कला सिखाता है.  Vastu Shastra के देवता भगवान विश्वकर्मा है.

जिस प्रकार सभी तत्व अणु से बने है और अणु, परमाणु से मिलकर बना है और सभी पदार्थो के परमाणुओं में Electron, Neutron और Proton की संख्या, स्थान और कार्य निश्चित होता है, उसी प्रकार किसी भी Construction / House / Shop etc.  में भी ऊर्जा तत्वों की संख्या, स्थान और कार्य निश्चित होता है. यदि किसी कारणवश किसी परमाणु में इलेक्ट्रान, प्रोटोन या न्यूट्रॉन की संख्या परिवर्तित हो जाये तो परमाणु की प्रकृति ही परिवर्तित हो जाती है और पदार्थ ही बदल जाता है, उसी प्रकार किसी भी construction में यदि तत्वों के स्थान में हेर फेर हो जाये तो उसका result भी बदल जाता है. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मूल रूप से दो प्रकार की शक्ति होती है Positive Energy और negative energy और इन्ही के Balance से पूरी सृष्टि चलती है.

हमने आपको एक आर्टिकल "घर के वास्तु में पंच तत्वों का स्थान और प्रभाव " में  समझाया था की पंच तत्व ( वायु, जल, पृथ्वी, अग्नि और आकाश) का स्थान कौनसा होता है और उनके प्रभाव क्या होता है और किस प्रकार हम इन तत्वों का Balance बना कर रख सकते है. Vastu shastra  हमें सिखाता है की किसी भी कंस्ट्रक्शन में कोनसा स्थान किस ऊर्जा तत्व का है और पूरा कंस्ट्रक्शन किस प्रकार बैलेंस किया जा सकता है.

What is Vastu Purush

Vastu Purush के सन्दर्भ  में माना जाता है की एक विशालकाय जीव प्राचीन समय में उत्पन्न हुआ और वह इतना बढ़ने लगा की सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसके मानव रूपी शरीर में ढकने लगा, तो देवतायों ने इसे रोकने का निर्णय लिया और देवताओं ने  इस जीव के चारों तरफ घेरा बनाकर उसे उल्टा करके जमीन में समाहित कर दिया, इस दानव रूपी शरीर वाले जीव को वास्तु पुरुष की संज्ञा दी गई. वास्तु पुरुष का मुख ईशान कोन (Isan Kone – North East), दोनों पैरो के घुटनों को मोड़कर दोनों तलवों को जोड़कर नेऋत्य कोण (Neritya Kone – South West),  हाथों की कोहनियाँ आग्नेय कोन ( Aagneya Kone – South East) और वायव्य कोन ( Vayavya Kone – North-West) बने. उस समय देवताओं ने जो स्थान ग्रहण किया था वास्तु शास्त्र में उन स्थान को उस देव के अधीन मान लिया गया.

ब्रह्म देव के वरदान के अनुसार वास्तु पुरुष को ध्यान में रखकर बनाए गए भवन में निवास करने वाले व्यक्ति को सुख, शांति, वैभव, लाभ आदि की प्राप्ति होती है.

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