यज्ञ (हवन) - Why We Should daily do Havan, Scientific Base of Yagya

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यज्ञ (हवन) - Why We Should daily do Havan, Scientific Base of Yagya 

वायु प्रदूषण का ऋग्वैदिक समाधान - यज्ञ (हवन) का वैज्ञानिक आधार 

जीने के लिए पर्यावरण से प्राप्त आॅक्सीजन की आवश्यकता होती है जिसे वेदों में प्राणवायु कहा गया है। वैदिक ऋषि प्राणवायु को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे प्राण और अपान वायु।
वायु की अनुकूल स्थिति बनाए रखना मानव का कर्तव्य है। अन्यथा इनकी प्रतिकूलता सबको नष्ट करने में सक्षम है। इसीलिए वायुमण्डल में व्याप्त यदि कोई दोष हो तो वायु शोधन हेतु ऋग्वैदिक युग में दो प्रणालियां विकसित की गयी प्रथम यज्ञ और द्वितीय औषधि वनस्पतियों का रोपण। वायुमण्डल में व्याप्त जहरीली गैसों के शुद्धीकरण हेतु यज्ञ का प्रावधान है जो वैदिक जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जाता है यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष से आज सम्पूर्ण विश्व को परिचित होना आवश्यक है। वायु की शुद्धता के लिए सुगन्धित द्रव्यों की हविषा से यज्ञ किया जाना चाहिए, जिससे वायु के शुद्ध स्वरूप की रक्षा की जा सके।
अयं यज्ञोः विश्वस्य भुवनस्य नाभिः कहकर यजुर्वेद में यज्ञ को समस्त संसार की नाभि बताया है। जिस प्रकार शरीर में नाभि का महत्त्वपूर्ण स्थान है उसी प्रकार संसार में यज्ञ का स्थान है। विश्व में यज्ञीय हवि को फैलाने का कार्य वायु उसी प्रकार करता है जैसे-शरीर में धातुओं को फैलाने का कार्य नस-नाडियां तथा हृदय आदि करते हैं।

यज्ञ में चार प्रकार के पदार्थ डाले जाते है -
1. सुगन्धित - कस्तूरी, केशर, श्वेत चन्दन, अगर, इलायची, जायफलआदि।
2. मिष्ठ - शक्कर, शहद, छुआरे, किशमिश आदि।
3. रोगनाशक - सोमलता, गिलोय आदि ओषधियां
4. पुष्टिकारक - घृत, दूध, फल, कन्द, चावल, गेहू, उड़द आदि।

अनेक लोगों की मान्यता है कि हवन से कार्बन-डाई-आॅक्साइड उत्पन्न होती है जो मनुष्य के लिए हानिकारक है किन्तु यदि यज्ञ में कार्बन-डाई-आॅक्साइड असीमित गति से निकलती होती तो वहां किसी का बैठना सम्भव नहीं होता। लोगों का दम घुटने लगता और वे वहां से चले जाते, किन्तु यज्ञ में ऐसा नहीं होता, बल्कि यज्ञ की सुगन्ध से लोग प्रफुल्लित हो उठते है। पापो से रहित तथा यज्ञशील मनुष्य की हवि को वायु स्वीकार करता है। पापों से रहित तथा यज्ञशील मनुष्य की हवि को वायु स्वीकार करता है - त्वं

यज्ञों के द्वार पर्यावरण शुद्धि के विषय में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग करके यज्ञों की महत्ता को प्रतिपादित किया हैं इस विषय में कतिपय वैज्ञानिकों के निष्कर्ष निम्नलिखित है -

1. फ्रांस के विज्ञानवेता ट्रिलवर्ट का कथन हे कि जलती हुई शक्कर मे वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति है। इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि बीमारियां तुरन्त नष्ट हो जाती है।
2. डाॅ. एम. ट्रेल्ट ने मुनक्का, किशमिश आदि फलों को जलाकर देखा तब उन्हें ज्ञात हुआ कि इनके धुंएं से टाइफाइड के रोग कीट 30 मिनट में और दूसरे रोगों के कीट घण्टे दो घण्टे में नष्ट हो जाते हं।
3. फ्रांस के डाॅ. हैफकिन का कहना है कि Havan में घी के जलाने से रोग कीट मर जाते हैं।

Yagya प्रकृति के बायोरिद्म पर अधारित है अमेरिकी मनोवैज्ञानिक श्री बेरी रैथनर जो पूणे विश्वविद्यालय में अग्निहोत्र पर शोध कर चुके हैं का कहना है कि - अग्निहोत्र वायुमण्डल में एक विशिष्ट ढंग का प्रभाव उत्पन्न करता है और उसका मानव मन पर चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है। उस चिकित्सकीय प्रभाव की आयुर्वेद में स्पष्ट चर्चा मिलती है।

 7 मई 1999 के हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुए एक समाचार में कहा गया है कि लखनउ के राहुल कर्मकर ने सिद्ध किया है कि भारतीय यज्ञ परम्परा जो दार्शनिक शक्ति पर आधारित है मात्र कुछ यौगिक पदार्थों का जलाना मात्र नहीं हैं ये हवा में घुले सल्फरडाईआॅक्साइड तथा नाइट्रोसआॅक्साइड को नष्ट करते हैं साथ ही जल के विषाणुओं को भी नष्ट करते है।

इसीलिए हमें Daily करना चाहिए Havan.

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