अगर शिव को प्रसन्न करना हो तो करें प्रदोष व्रत

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एकादशी की भांति प्रत्येक मास में प्रदोष व्रत दो बार आता है. प्रदोष कहते है रात्रि आरन्भ के समय को, यह प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी  तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है.  मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेवजी कैलाश पर्वत पर  नृत्य करते हैं . इस व्रत के पूजन का विधान इसी समय होता है, इसीलिए इसे "प्रदोष व्रत" कहते है. इस व्रत के उपास्य देवता भगवान शिव है , शिवजी की प्रसन्नता और पुत्र प्राप्ति की कामना से यह व्रत किया जाता है. दाम्पत्य जीवन में सामंजस्य हेतु इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते है.

     इस व्रत का आरन्भ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशीको जब शनिवार  पड़े तब करना चाहिए. इस दिन पुरे दिन उपवास रख कर शिवपूजा के बाद,  सांयकाल एक समय भोजन करना चाहिए.  भगवान शिव को प्रशाद में खीर का भोग लगाना चाहिए.

यह व्रत इस कलियुग में अति मंगलकारी और भगवान शिव कृपा प्रदान करने वाला होता है.  जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं. प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है.  सुबह स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर (अपनी सामथ्र्य के अनुसार पूजन सामग्री) बेल पत्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान को चढ़ाएं, संभव हो सके तो पति-पत्नी एक साथ बैठकर शिव जी का पूजन करें. शाम के समय पुन: स्नान करके इसी तरह शिवजी की पूजा करें. यदि मंत्र इत्यादि न आता हो तो नम: शिवाय का उच्चारण करते हुए पूजन करें. पूजन के उपरांत शुद्ध सात्विक आहार ग्रहण करें. इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

 

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