शक्तिपीठ कामाख्या : इतिहास परिचय

kamakhya

दक्ष यज्ञ में शिव पत्नी "सती" ने अपने पति भगवान भोलेनाथ का अपमान देखकर, यज्ञ स्थल पर ही योगाग्नि में अपने देह का त्याग कर दिया. भगवान शिव घटना की जानकारी मिलते ही प्रकट हुए और सती की जड़ देह को लेकर आकाश मार्ग से चल दिए.

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भगवान शंकर को इस रूप में देखकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती की जड़ देह के 51 (कहीं कहीं 50 भी माना गया है ) खण्ड किये और जहाँ जहाँ खण्ड गिरते  गए वहां वहां शक्ति पीठ बनते गए . जहाँ भगवती सती की महामुद्रा (योनी खण्ड) गिरी वह स्थान माँ कामाख्या का शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है.

   नील पर्वत स्थित कामाख्या शक्तिपीठ में माँ आध्यशक्ति अपनी तीनों महाशक्तियों (महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती) के रूप में निज मंदिर योनी-मंदिर में विराजमान है. कामेश्वर-कामेश्वरी का स्वरूप भी चलंतामंदिर  में विराजमान है.

प्रति वर्ष भगवती के योनी से रक्तस्त्राव होता है अर्थात् माँ भगवती रजस्वला स्थिति में आती है. लगभग आषाढ़ महीने में यह क्रम होता है ( 21 जून से 25 जून या  22 जून से 26 जून का समय) तीन दिन मंदिर बंद रहता है. यह पर्व अंबुवाची कहलाता है.

कामाख्या इतिहास पौराणिक काल से लेकर अब तक के ग्रंथों में उपलब्ध है जिनमे ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, शिवपुराण, देवी पुराण, कलिका पुराण एवम् योगिनिह्र्दय आदि प्रमुख है.

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