जानें क्या है शास्त्रीय विधान प्रातःकाल "कर" (हथेली) दर्शन का

HATH

कराग्रे वसते लक्ष्मी: कर मध्ये सरस्वती !

करमूले तू गोविन्द:, प्रभाते कर दर्शनम् !!

अर्थात् हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, हाथ के मध्य भाग में सरस्वती रहती है और हाथ के मूलभाग में भगवान नारायण गोविन्द रहते है. इसलिए प्रातःकाल "कर"  (हाथ) का दर्शन करना चाहिए.

   उपर्युक्त श्लोक बोलते हुए अपने हथेलीयों को जोड़ कर दर्शन करना चाहिए. यह शास्त्रीय विधान बड़ा ही अर्थपूर्ण है. इससे मानव के मन में आत्मनिर्भरता और स्वालम्बन  की भावना बढती है. वह जीवन के प्रत्येक कार्य में दूसरों के भरोसे न रहकर - अपने हाथों की तरफ देखने का अभ्यासी बन जाता है. संसार में मनुष्य भरा-बुरा जो भी कार्य करता है, हाथ से ही करता है. ये हाथ ही - अर्थ, धर्म, कम और मोक्ष की कुंजी है. मूल श्लोक में बतलाया गया है की मानव जीवन की सफलता के लिए संसार में तीन वस्तुओं की आवश्कता है - धन, ज्ञान एवम ईश्वर. इनमे से एक बिना भी जीवन अधुरा है. यह तीनों लक्ष्यभुत वस्तुएं हमारे हाथ, जो की कर्म के प्रतिक है, में निवास करती है, अर्थात् हाथों द्वारा शुभ कार्य करके हम इन वस्तुओं को प्राप्त कर सकते है. इसलिए हाथों का अवलोकन करते हुए श्लोक पठित भावना को आत्मसात करना चाहिए एवम्  दृढ़ निश्चय करना चाहिए की में दूसरों के सहारे न रह कर अपने हाथों के ऊपर निर्भर रहूँगा, इनसे  परिश्रम करके में दरिद्रता को परास्त करूँगा और अंत में मेरे गोविन्द को प्राप्त कर जीवनमुक्त होऊंगा.

साभार - गृहस्थ गीता

नित्य पूजन में कुछ विचारणीय तथ्य

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