Why use Dabh in Eclipse ( Grahan ) ? क्यों करते है डाभ ( कुशा ) का प्रयोग ग्रहण के समय

Why use Dabh ( kusha) at the time of Eclipse ( Grahan ) ?

डाभ ( कुशा ) का प्रयोग ग्रहण के समय किस लिए किया जाता है ?

हम सभी को पता है सनातन शास्त्रों के अनुसार राहू-केतु जब चन्द्र या सूर्य को हावी होने की कोशिश करते है तो इसे ग्रहण कहा जाता है. राहू का नाम तम (अन्धकार) है. जब तमोगुण द्वारा सात्विक प्रकाश को दबा दिया जाता है तो उसकी शक्ति तमोगुण से अशुद्ध हो जाती है, इसका प्रभाव खाने पीने की वस्तुओं पर सबसे अधिक पड़ता है और ऐसे पदार्थों को खाने से मनुष्यों में भी तमोगुण बढ़ता है. बुद्धि आसुरी हो जाती है, दिमाग निर्बल हो जाता है और शरीर में भरपूर आलस्य छा जाता है.

जब डाभ जिसका शास्त्रीय नाम कुशा है, को हम इन पदार्थों पर रख देते है तो वै दूषित नहीं होते, एक प्रकार से कुशा तमोगुणी रूपी बिजली के लिए कुचालक का कार्य करती है.सूर्य ग्रहण के समय के घंटे पूर्व और चंद्रग्रहण के समय के घंटे पूर्व कुशा को खाने-पीने की वस्तुओं पर और पानी के बर्तनों पर रख देना चाहिए.

शास्त्रों के अनुसार जब हिरण्याक्ष के द्वारा पृथ्वी पाताल में ले जाई गई तो भगवान विष्णु ने वाराह का अवतार लिया और समुद्र के रस्ते से पाताल में प्रवेश किया. समुद्र के अन्दर से जाने-आने के कारण उनके शरीर से कीचड़ चिपक गया था, भगवान ने उससे निवृत होने के लिए अपने विशाल शरीर को झाडा, और झाड़ते समय शरीर के कुछ केश टूटकर इधर-उधर गिर गए. और वही डाभ / कुशा के रूप में बड़ी तेजस्वी वनस्पति के रूप में उगने लगे, जो की यज्ञ में विघ्न बाधाओं को दूर करने के काम में आता है.

डाभ का प्रयोग देव पितृ कार्य आदि में होता है, यह एक दिव्य विलक्षण अग्नितत्व है.

 

Leave a reply