रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग - Rameshwaram Jyotirling Darshan, Tirth Yatra of Mahadev Temple, India

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रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग - Rameshwaram Jyotirling Darshan, Tirth Yatra of Mahadev Temple, India

भारत के दक्षिण दिशा में रामेश्वरम धाम स्थित है। सदियों पहले यह स्थान भारत की भूमि ये जुड़ा था, पर किसी प्राक्रतिक घटना के कारण इसका संबंध टुट गया और इस प्रकार यह एक द्विप में परिवर्तित हो गया। इसे रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग द्वीप या पुराणों के अनुसार गंधमादन पर्वत कहा जाता हैं। यह द्वीप बंगाल की खाड़ी व अरब सागर के संगम स्थल पर स्थित हैं और 25 किलोमीटर लंबा तथा 2,16 किलोमीटर चौड़ा है। भारत के मुख्य तीर्थों में इसका अधिक महत्व है और चूंकि इसे श्रीराम ने शिव लिंग निर्माण हेतु चुना था, अतः इसका नाम रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग हूआ।
दक्षिण की ओर सुदूर सागरतट पर स्थित Rameshwaram Jyotirling एक प्रमुख तीर्थस्थान के साथ-साथ भारतीय शिल्पकला का एक उत्कृष्ट नमूना भी पेश करता है। पुरोणों में गंधमादन पर्वत का वर्णन हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में इस तीर्थ की गणना कर जाती हैं। Rameshwaram Tirth  का ऐतिहासिक महत्व भी आस्था के लिए उद्दीपन का कार्य करता हैं।  नल तथा निल ने अपनी शिल्पकला से सौ योजन लंबा तथा दस योजन चौड़ा पुल तैयार किया ।

सागरतट के निकट भगवान विष्णु  के महाशंख की आकृति का एक द्वीप हैं, जिसे शंखद्वीप भी कहते हैं। देवी सीता को छुडा लाने के लिए श्रीराम ने लंकाधिपति रावण के विरूद्ध अभियान शुरू किया था। वहां पहुंचने के लिए रामचन्द्रजी ने नल और नील के साथ अपनी वानर सेना की सहायता से सागर पर सेतु का निर्माण किया था। इसी पौराणिक कथा के आधार पर दक्षिण के इस तीर्थ को सेतुबंध रामेष्वरम् कहा जाता है।

 

रामेश्वरम्  मंदिर Rameshwaram Temple

यहां श्री रामनाथ स्वामी का पावन एवं भव्य मंदिर हैं। चांदी के त्रिपुंड़ तथा श्वेत उत्तरीय के कारण इस शिवलिंग की छवि अद्भुत हैं। यह मंदिर लगभग हजार फिट लंबा और छः सौ पचास फिट चौड़ा, एक सौ पच्चीस फुट उंचा है।
इस मंदिर के केंद्र में श्री राम द्वारा स्थापित स्फटिक से बना हुआ अत्यंत सुंदर ज्योतिर्लिंग है, जिसकी पूजा-अर्चना नित्यप्रति संगीत-समारोह के साथ की जाती हैं। इस परंपरा के अनुसार केवल हरिद्वार से लाया गया गंगा जल ही चढ़ता हैं। सागरतट पर बने इस शानदार मंदिर के चारो ओर ऊँची चारदिवारी है। पूर्व और पश्चिम की ओर क्रमशः दस और सात मंजिले गोपुरम् हैं, जिन पर अनेक देवी-देवताओ व पशु-पक्षियों कर मूर्तिया उत्कीर्ण हैं। ये विशाल गोपुरम् दुर से ही दिखाई हैं
इस मंदिर के चारों ओर पत्थर के कलापूर्ण स्तंभों ये बना हुआ भव्य और अद्वितीय परिक्रमा-पथ है। करीब बारह सौ मीटर के घेरे वाली इस दीर्घा में कुल मिलाकर ग्यारह सौ स्तम्भ हैं। संसार मे सबसे बड़ा परिक्रमा-पथ माना जाता हैं। मंदिर के आंतरिक द्वार के सामने सोने से मढ़ा हुआ सुंदर ध्वज-स्तंभ है। वहीं पर सफेद रंग के नंदी की करीब चार मीटर उंची प्रमिमा स्थित हैं।

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